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जब साक्षी ने अपनी छात्रवृत्ति हासिल की और दूसरों के लिए भी रास्ता खोला

  • Writer: We, The People Abhiyan
    We, The People Abhiyan
  • Jun 22
  • 3 min read

कई वर्षों तक साक्षी उस छात्रवृत्ति का इंतज़ार करती रही जो कभी नहीं मिली।


झांसी के केशवपुर गाँव में रहने वाली साक्षी जब 16 साल की थी, तब उसका सपना था कि वह आगे पढ़ाई करे। उसके लिए छात्रवृत्ति सिर्फ आर्थिक सहायता नहीं थी, बल्कि अपने सपने को पूरा करने का एक जरिया भी था।कक्षा 10 से ही उसने छात्रवृत्ति के लिए आवेदन करना शुरू कर दिया था। पूरे स्कूल के दौरान वह लगातार आवेदन करती रही और हर बार उम्मीद करती थी कि इस बार उसका आवेदन मंजूर हो जाएगा। लेकिन कोई जवाब नहीं आया। कभी दस्तावेज़ों में समस्या बताई गई, तो कभी कोई कारण ही नहीं बताया गया। इसी अनिश्चितता में तीन साल बीत गए।


साल 2025 में, जब उसने बी.ए. में प्रवेश लिया, तो साक्षी ने तय किया कि अब वह चुप नहीं बैठेगी। 18 साल की उम्र में उसने खुद एसडीओ कार्यालय जाना शुरू किया, दस्तावेज़ों की जानकारी जुटाई और अपनी छात्रवृत्ति की स्थिति के बारे में पूछताछ की।


साक्षी बताती है, “जिन मैडम को हमने आवेदन दिया था, उन्होंने हमारी आवेदन जमा ही नहीं की थी। फिर हमने खुद अपनी आवेदन भरी और जमा की।


करीब तीन महीने तक लगातार कार्यालय के चक्कर लगाने, कागज़ी प्रक्रियाएँ पूरी करने और जानकारी लेने के बाद आखिरकार उसकी छात्रवृत्ति मंजूर हो गई।

लेकिन साक्षी में यह आत्मविश्वास अचानक नहीं आया था।


घर पर साक्षी ने अपनी माँ को जलसहेली के रूप में काम करते देखा था। जलसहेली महिलाओं का एक समूह होता है जो गाँव में पानी से जुड़ी समस्याओं पर काम करता है। सीमित शिक्षा होने के बावजूद उसकी माँ गाँव की बैठकों में सक्रिय रूप से भाग लेती थीं और सरकारी संस्थाओं से संवाद करती थीं। उन्हें सवाल पूछते और समाधान खोजते देखकर साक्षी पर गहरा प्रभाव पड़ा।


माँ से प्रेरित होकर साक्षी भी बैठकों में जाने लगी और गाँव की किशोरियों के साथ चर्चाओं में भाग लेने लगी। वर्ष 2024 में, जब वह कक्षा 11 में पढ़ रही थी, तब उसने परमार्थ संस्था और वी द पीपल अभियान संस्था द्वारा आयोजित एक क्षमता-विकास प्रशिक्षण में हिस्सा लिया। परमार्थ उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में जल सुरक्षा और सामुदायिक विकास के क्षेत्र में काम करने वाली एक संस्था है। इस प्रशिक्षण में शिक्षा का अधिकार, शोषण से सुरक्षा और शिकायत निवारण जैसे संवैधानिक अधिकारों पर चर्चा हुई। शिक्षा और छात्रवृत्ति से जुड़ी चर्चाओं ने साक्षी को विशेष रूप से प्रभावित किया।


वह कहती है, “पहले मुझे इन बातों की ज्यादा समझ नहीं थी। लेकिन जब शिक्षा और छात्रवृत्ति के बारे में बताया गया, तब मुझे लगा कि यह मेरे जीवन से जुड़ा हुआ विषय है। मैं खुद एक छात्रा थी, इसलिए मैंने इसे ध्यान से समझा।”


आज साक्षी मानती है कि इस प्रशिक्षण ने उसे यह समझने में मदद की कि छात्रवृत्ति कोई एहसान नहीं, बल्कि उसका अधिकार है। यही सीख बाद में उसके काम आई और उसने पूरे आत्मविश्वास के साथ अपनी छात्रवृत्ति पाने के लिए प्रयास किया। बाद में जब गाँव की दूसरी लड़कियों को भी छात्रवृत्ति पाने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, तो साक्षी ने उन्हें प्रक्रिया समझाई और मदद की। उसकी मदद से कई लड़कियाँ अपनी छात्रवृत्ति प्राप्त कर सकीं।


आज साक्षी किशोरियों के साथ शिक्षा, स्वास्थ्य और स्वच्छता जैसे विषयों पर चर्चा करती है। वह किसान समूहों के साथ भी सक्रिय है और किसानों को कृषि संबंधी जानकारी और हेल्पलाइन सेवाओं से जोड़ने में मदद करती है।

साक्षी के लिए सक्रिय नागरिकता का मतलब बहुत सरल है - “सबको मिलकर काम करना चाहिए और एक-दूसरे का सहयोग करना चाहिए।


अपनी छात्रवृत्ति पाने के संघर्ष से शुरू हुई उसकी यात्रा आज दूसरों को अवसरों, जानकारी और सहायता तक पहुँचाने की एक मजबूत प्रतिबद्धता बन चुकी है।



The above story has been written and published with the explicit consent of the individual involved. All facts presented are based on WTPA's direct interaction with the individual, ensuring accuracy and integrity in our reporting.




 
 
 

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