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दुर्गेश: स्कूल को फिर एक विकल्प बनाते हुए

  • Writer: We, The People Abhiyan
    We, The People Abhiyan
  • Jan 21
  • 3 min read

दुर्गेश जिन बच्चों के साथ काम करते हैं, उनमें से ज़्यादातर बच्चों कि ज़िंदगी में स्कूल का दूर दूर तक नाम नहीं था। कुछ बच्चे बहुत जल्दी स्कूल छोड़ चुके थे। कुछ का कभी स्कूल में नामांकन ही नहीं हुआ था। कई बच्चे फल फ्रूट कि मंडी में या अपने परिवार के साथ काम करते थे, जिससे उनकी थोड़ी आमदनी हो जाति थी, जो उस समय पढ़ाई से ज़्यादा ज़रूरी प्रतीत होती थी। उन्हें स्कूल से दूर रखने की वजह उनकी दिलचस्पी की कमी नहीं थी, बल्कि काग़ज़ी काम, ग़रीबी, स्कूल से दूरी और यह चुपचाप बनी सोच थी कि स्कूल उनके लिए है ही नहीं।

और ठीक इसी समय दुर्गेश उनकी ज़िंदगी में आते हैं।

दुर्गेश का मानना है कि “शिक्षा सही दिशा सिखाती है, सही और ग़लत दिखाती है”। इसी विश्वास ने उन्हें परिवारों, दफ़्तरों और संस्थानों के पीछे लगातार लगे रहने की ताक़त दी। वे दस्तावेज़ों के लिए लोगों के पीछे गए, रसीदों की व्यवस्था की, पार्षदों और विधायकों से बहस की, और सरकारी दफ़्तरों के चक्कर बार-बार लगाए - जब तक आधार कार्ड नहीं बन गए और बच्चों का दाख़िला नहीं हो गया। जब बच्चे लिख नहीं पाते थे और बुनियादी शर्तें पूरी न होने के कारण उन्हें दाख़िला नहीं मिलता था, तो दुर्गेश ने अक्षरों से शुरुआत नहीं की। उन्होंने बच्चों से चित्र बनवाए। चित्र बनाना पेंसिल पकड़ने में बदला। पेंसिल पकड़ना लिखने में बदला। और लिखना दाख़िले में बदल गया।

आज चालीस से पचास बच्चे पढ़ाई जारी रख पाए हैं, क्योंकि दुर्गेश पीछे नहीं हटे।

दुर्गेश की यह लगन सिर्फ़ धैर्य नहीं है। यह ज़िद है, जो उनके अपने जीवन के अनुभवों से बनी है।

दुर्गेश की उम्र सिर्फ़ दस साल थी, जब उन्होंने मध्य प्रदेश के इंदौर शहर में काम करना शुरू किया। रोज़ हाथ में पैसा आता था, जिससे खाना और ज़िंदगी तो चलती थी, पर पढ़ाई बहुत दूर की चीज़ लगती थी। एक संगठन के ज़रिये उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी, लेकिन उनके आसपास के बच्चे काम करते रहे।

आज वे उन बच्चों के साथ खड़े होना चाहते हैं, जो उन्हें अपनी ही तरह लगते हैं - पैसे की आमदनी में फँसे हुए, स्कूल को लेकर असमंजस में, और एक अहम मोड़ पर खड़े हुए। लेकिन दुर्गेश इस काम तक प्रेरणा से नहीं पहुँचे। वे यहाँ बेचैनी के रास्ते पहुँचे, एक ऐसी बेचैनी, जो उनके संविधान से जुड़ने के बाद शुरू हुई।

अलग अलग अनुभवों ओर प्रशिक्षणों के माध्यम से दुर्गेश को अपने पहले फैसलों के नतीजों का सामना करना पड़ा। कभी वह अपने मोहल्ले में फैली कठोर सोच और सामाजिक रिवाज़ों से काफ़ी प्रभावित थे - जिसमें जाति की ऊँच-नीच भी शामिल थी। संविधान के साथ गहराई से जुड़ने पर उन्हें यह समझ आने लगा कि श्रेष्ठता के विचार उन्होंने अपने भीतर कितनी गहराई से बसा लिए थे और कैसे एक समय पर यह भेदभाव उन्हें सामान्य, बल्कि सही तक लगता था।

उस समय मुझे लगता था कि मैं सही कर रहा हूँ,” वे कहते हैं। “पर बाद में समझ आया कि मेरे हाथों से किसी और के मूल्यों और अधिकारों का हनन हो रहा था।

यही समझ उनके जीवन में एक निर्णायक मोड़ बन गई।

आज वे उन्हीं समुदायों के साथ क़रीब से काम करते हैं, जिन्हें वे कभी अपने से नीचा मानते थे, ऐसे समुदाय जो रोज़ हिंसा और बहिष्कार का सामना करते हैं। शाम की ट्यूशन कक्षाओं में वे बच्चों को सिर्फ़ स्कूल के विषय नहीं पढ़ाते, बल्कि जाति, आरक्षण और अधिकारों पर भी बातचीत करते हैं। यह बातचीत वे खेलों, नुक्कड़ नाटकों और संवाद के ज़रिये करते हैं, सिर्फ आदेश या उपदेश की तरह नहीं। इसके साथ साथ, दुर्गेश अपनी क्षमता को मज़बूत करने के लिए अलग-अलग प्रशिक्षणों में हिस्सा लेते रहते हैं। ऐसे ही एक वी द पीपल अभियान (WTPA) द्वारा आयोजित प्रशिक्षण मे उन्होंने पत्र लिखने और आवेदन तैयार करने जैसे स्किल्स सीखी। इस सहयोग ने उन्हें, संविधान और मौलिक अधिकारों के आधार पर अपनी माँगें साफ़ और मज़बूती से रखने में मदद की।

दुर्गेश के लिए संवैधानिक मूल्य किताबों की बातें नहीं हैं। वे उन्हें अपनी ज़िंदगी में उतारते हैं। वे बहुत मज़बूती से, पीढ़ियों से चली आ रही परंपराओं को तोडने का प्रयास करते हैं। बहिष्कार, धमकियों, मज़ाक और पैसों की तंगी के बावजूद भी, वे डटे रहते हैं।

वे अपने काम को एक लंबी प्रक्रिया का हिस्सा मानते हैं, जहाँ इन मूल्यों को जीना ही, उन्हें सामने लाता है, और धीरे-धीरे वही बदलाव की वजह बनता है। वे खुद को उस पीढ़ी का हिस्सा मानते हैं जो खुद की समझ बनाकर ऊँच-नीच के भेदभाव से दूर जा रही है, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ अपनी ज़िंदगी, अपने रिश्ते और अपने मूल्य सम्मान के साथ चुन सकें।


The above story has been written and published with the explicit consent of the individual involved. All facts presented are based on WTPA's direct interaction with the individual, ensuring accuracy and integrity in our reporting.




 
 
 

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