सारी राहें संविधान पर ही आ रही हैं
- We, The People Abhiyan

- Jan 21
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कभी-कभी दीपाली खुद से पूछती हैं - क्या उन्होंने संविधान को चुना, या संविधान ने उन्हें। उनका सफ़र लॉकडाउन के दौरान शुरू हुआ, जब वे संवैधानिक जागरूकता पर एक ऑनलाइन सत्र से जुड़ीं। वे वहाँ न तो शिक्षक थीं, न वक्ता, बस एक श्रोता। उस दिन न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व जैसे शब्द उन्हें बिल्कुल नए अर्थों में छू गए। जिन कक्षाओं में वे पहले पढ़ाती थीं, वहाँ सोचने से ज़्यादा आज्ञाकारिता को महत्व दिया जाता था। उस दिन कुछ बदल गया।
उसी बदलाव से कांस्टीट्यूशनल स्कूल का विचार निकला - एक ऐसा मॉड्यूल जिसमें उन्होंने कहानियों, खेलों और सिलेबस को मिलाकर सीखने के नए प्रयोग किए। उन्होंने देखा कि बच्चे ऐसे सवाल पूछने लगे हैं, जो उन्होंने पहले कभी नहीं पूछे थे। दीपाली कहती हैं, “आज बीज बो दो, दस साल बाद एक मज़बूत पेड़ खड़ा होगा।” उनके लिए हर सवाल बदलाव का एक बीज था।
2022 में, संविधान से और गहरे जुड़ने की चाह में, दीपाली संविधान प्रचारक से जुड़ीं। यह एक ऐसा स्पेस था जहाँ न कोई पद था, न ज़बरदस्ती, हर किसी को अपनी राह खुद खोजने की आज़ादी थी। उनके लिए यह संविधान को जीते हुए देखने जैसा था। इसी दौरान उन्होंने अपने कांस्टीट्यूशनल स्कूल मॉड्यूल को और निखारा, उसे ज़्यादा अनुभव आधारित और रोज़मर्रा की ज़िंदगी से जुड़ा बनाया।
आज दीपाली एक फ़ैसिलिटेटर और फ़ेलो के रूप में महाराष्ट्र भर में काम कर रही हैं। कभी किसी समूह के साथ, तो कभी स्वतंत्र रूप से - उनका काम संवाद और सोचने की जगहें बनाने पर केंद्रित है। उन्हें वी द पीपल अभियान के साथ हुई एक ट्रेनिंग याद है, जहाँ उन्होंने सिटिज़न अड्डा सत्रों के आयोजन में मदद की। ऐसे पल उनके इस विश्वास को और मज़बूत करते हैं कि संवैधानिक समझ सबसे अच्छी तरह बातचीत और अनुभव से ही विकसित होती है। सीखने की उत्सुकता के चलते उन्होंने उस ट्रेनिंग में खुद भी हिस्सा लिया। बाद में वही मॉड्यूल महिलाओं के साथ काम करते समय बहुत काम आए - समस्याओं को पहचानने और उन्हें उनके अधिकारों से जोड़ने में।
उनकी फ़ैसिलिटेशन की एक सरल पंक्ति है - “मैं तुम्हारे साथ हूँ, पर सफ़र तुम्हारा है। जहाँ दिक्कत आएगी, वहाँ दीपाली है।”
दीपाली की अपनी पहल चांगभलं फाउंडेशन इस काम को और आगे बढ़ाती है। “चेंज थ्रू आर्ट” के सिद्धांत पर चलते हुए, यह परफॉर्मेंस, वर्कशॉप और संवैधानिक सीख के ज़रिए एक समानतावादी संस्कृति बनाने की कोशिश करती है, जो सबसे हाशिए पर खड़े लोगों तक भी पहुँचे।
दीपाली के लिए ज्ञान सिर्फ़ शुरुआत था। दिशा उसे संविधान ने दी। और आज वे जानती हैं -
सारी राहें संविधान पर ही आ रही हैं।
The above story has been written and published with the explicit consent of the individual involved. All facts presented are based on WTPA's direct interaction with the individual, ensuring accuracy and integrity in our reporting.

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