जब शांति ने इंकार को दर्ज कराया
- We, The People Abhiyan

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अगले दिन वह मज़दूरों के साथ काम की जगह पहुँचीं। वहाँ ठेकेदार ने कहा कि उसके पास पहले से ही पर्याप्त मज़दूर हैं और इन लोगों के लिए जगह नहीं है। शांति वापस गाँव लौट आईं। उन्होंने साइट पर बहस करने के बजाय एक आवेदन लिखने का फैसला किया। यह आवेदन उन्होंने प्रखंड विकास पदाधिकारी को संबोधित किया। उसमें साफ़ लिखा कि मस्टर बनने के बाद काम से इंकार करना संविधान में दिए गए अधिकारों का उल्लंघन है। यह कोई गुहार या दया की अपील नहीं थी, बल्कि एक उल्लंघन को दर्ज करने की बात थी, और यह माँग कि उसे स्वीकार किया जाए।
प्रखंड कार्यालय से जवाब आया कि सातों मज़दूरों को बेरोज़गारी भत्ता दिया जाए। काम नहीं मिला, लेकिन इंकार को औपचारिक रूप से दर्ज किया गया और उसके बदले मुआवज़ा मिला।
शांति इस घटना को सफलता नहीं मानतीं। वह सीधा कहती हैं - “काम नहीं मिला।” लेकिन काम से मना किए जाने के बाद मज़दूरों को उनका कानूनी हक़ मिला। उनके लिए इस घटना का मतलब यह था कि सिर्फ़ इंकार हो जाना किसी दावे का अंत नहीं होता।
यह घटना झारखंड के पहाड़पुर पंचायत के कुसुंबा गाँव की एक बड़ी रोज़मर्रा की सच्चाई को भी दिखाती है। पंचायत में मनरेगा चल रहा है, लेकिन सबको बराबर पहुँच नहीं है। लगभग आधे लोगों को ही काम मिल पाता है, बाकी लोग बिना काम के रह जाते हैं और अक्सर गाँव से बाहर पलायन कर जाते हैं। समस्या योजना की कमी नहीं, बल्कि सीमित पहुँच और असमान क्रियान्वयन की है।
पिछले दो वर्षों से अंबेडकर सामाजिक संस्थान के साथ काम करते हुए शांति का काम ज़्यादातर जागरूकता और आख़िरी छोर तक पहुँच सुनिश्चित करने से जुड़ा रहा है - सरकारी योजनाओं की जानकारी देना, मनरेगा से जुड़े मामलों में मज़दूरों के साथ जाना, और महिलाओं को ग्रामसभा की बैठकों में आने के लिए प्रेरित करना। वह बताती हैं कि बहुत-सी महिलाओं को यह तक नहीं पता होता कि मनरेगा के तहत वे किस तरह का काम कर सकती हैं।
काम से इंकार की इस घटना के बाद शांति का नज़रिया बदल गया। पहले आवेदन बस औपचारिक तौर पर लिखे जाते थे। लेकिन वी द पीपल अभियान (WTPA) की ट्रेनिंग के बाद उनके आवेदन ज़्यादा सटीक हो गए। वह अब साफ़ तौर पर उल्लंघन का ज़िक्र करती हैं, संविधान का हवाला देती हैं, और यह सुनिश्चित करती हैं कि हर आवेदन को आधिकारिक तौर पर स्वीकार किया जाए। इससे शिकायतों पर कार्रवाई का तरीका भी बदला और आगे सवाल पूछने का भरोसा भी बढ़ा।
शांति अक्सर बताती हैं कि बराबरी के हक़ को समझने से उनके भीतर का डर कम हुआ। वह कहती हैं, “जब पता चला कि बराबरी का हक़ दिया गया है, तो डर कम हो गया।” पहले वह बैठकों से कतराती थीं और अधिकारियों से सवाल पूछने में झिझकती थीं। अब वह ग्रामसभा और पंचायत की बैठकों में सक्रिय रूप से हिस्सा लेती हैं, और खास तौर पर महिलाओं को आगे आने के लिए कहती हैं। उनके मुताबिक, अगर एक महिला भी आगे आती है, तो वह कई और महिलाओं के लिए रास्ता खोल देती है।
आज उनका काम सिर्फ़ मनरेगा तक सीमित नहीं है। वह पेंशन कैंप और काम माँगो अभियान जैसी गतिविधियों में भी शामिल रही हैं। पिछले दो सालों में उनके लगातार जुड़े रहने से लगभग अस्सी लोगों को फ़ायदा हुआ है - किसी बड़े या नाटकीय हस्तक्षेप से नहीं, बल्कि नियमित फ़ॉलो-अप, दस्तावेज़ीकरण और लगातार मौजूद रहने से।
कुछ साल पहले, शादी के बाद जब वह इस गाँव में आई थीं, तो उन्हें दूसरों पर निर्भर महसूस होता था। आज लोग उन्हीं के पास मदद के लिए आते हैं - उन प्रक्रियाओं को समझने के लिए, जो कभी उन्हें खुद डराती थीं। सात मज़दूरों का मामला आज भी एक मिसाल की तरह याद किया जाता है, इसलिए नहीं कि उसका अंत पूरी तरह आदर्श था, बल्कि इसलिए कि उसने दिखाया कि इंकार को दर्ज किया जा सकता है, उस पर सवाल उठाया जा सकता है, और उसका जवाब माँगा जा सकता है।
कभी-कभी बदलाव की शुरुआत बस एक ऐसे पत्र से होती है, जो अपने हक़ को साफ़ तौर पर सामने रखता है।
The above story has been written and published with the explicit consent of the individual involved. All facts presented are based on WTPA's direct interaction with the individual, ensuring accuracy and integrity in our reporting.

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