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दीपमाला: बदलाव की शुरुआत एक सवाल से होती है

  • Writer: We, The People Abhiyan
    We, The People Abhiyan
  • 19 hours ago
  • 3 min read

“अगर तुम्हें लगता है कि जो तुम कर रहे हो वो सही है, तो उसे लिखकर पुलिस को दे दो। कहो कि ये प्रथा जो हम निभा रहे हैं, वो सही है।”

बारह साल पहले दीपमाला ने ये बात रानीपुर गाँव की सरपंच के आँगन में कही थी। सरपंच एक महिला थी, लेकिन सब जानते थे कि असली ताकत उसके पति के पास थी, जोकि एक पुलिस था। उनके घर के भीतर एक शौचालय बनाया गया था, जिसे कोई और हाथ से साफ करता था, क्योंकि उस घर की औरतों को बाहर निकलने की इजाज़त नहीं थी।
बारह साल पहले दीपमाला ने ये बात रानीपुर गाँव की सरपंच के आँगन में कही थी। सरपंच एक महिला थी, लेकिन सब जानते थे कि असली ताकत उसके पति के पास थी, जोकि एक पुलिस था। उनके घर के भीतर एक शौचालय बनाया गया था, जिसे कोई और हाथ से साफ करता था, क्योंकि उस घर की औरतों को बाहर निकलने की इजाज़त नहीं थी।

आँगन में हुई एक बैठक के दौरान, दीपमाला को यह बात पता चली और यह भी कि उस शौचालय को साफ करने के लिए उसकी अपनी मौसी को मजबूर किया जा रहा था। दीपमाला ने इसका विरोध किया। सरपंच ने उसे “फालतू झगड़ा करने वाली” कहकर चुप कराने की कोशिश की। लेकिन दीपमाला नहीं झुकी। उसने कहा कि अगर यह काम सही है तो इस काम के बारे में लिखकर पुलिस को दे दो। सरपंच का परिवार उसकी बात से बुरी तरह हिल गया, मगर उन्होंने उसकी बात को रफा दफा  कर दिया। उनके बेटे ने दीपमाला को धमकाया यह कहकर कि वह दोबारा गाँव में कभी कदम न रखे। 

लेकिन संघर्ष दीपमाला के लिए नया एहसास नहीं था। वह गाज़ीपुर के मोहम्मदाबाद में जन्मी थी, उस समुदाय में जो पीढ़ियों से मैला ढोने का काम करती आई थी - बिना सम्मान, बिना सुरक्षा, और बिना इंसाफ़ की मज़दूरी के। बचपन से ही दीपमाला के मन में सवाल उठते रहते - “हम ही क्यों? यही काम क्यों? क्या हम हमेशा अछूत ही रहेंगे?”

यही सवाल उसकी राह बन गए और उसे उस आँगन तक ले आए, जहाँ उसने वो सवाल पूछा जो किसी ने पहले कभी नहीं पूछा था।

और इस बार, सवाल के साथ बदलाव भी आया।

दो महीने बाद, दीपमाला को पता चला कि वो शौचालय तोड़कर नया बनाया गया है यानि अब किसी को हाथ से साफ नहीं करना पड़ेगा । बदलाव का ढांचा छोटा-सा था, लेकिन उसका असर ईंटों से कहीं बड़ा था। इस घटना ने दीपमाला को और मज़बूत किया। वह अपने समुदाय के और लोगों से मिलने लगी, उनसे बात करने लगी, उनके तर्क सुनने लगी।  कई लोग बोले, “अगर हम ये काम छोड़ देंगे, तो अपने बच्चों को क्या खिलाएँगे?” दीपमाला ने जवाब दिया, “अगर दूसरे लोग अलग काम करके जी सकते हैं, तो हमारे बच्चे क्यों नहीं?

जातिगत भेदभाव के खिलाफ़ उसकी लड़ाई ने उसे और मुद्दों से भी सामना कराया। उसे एहसास हुआ कि जाति और जेंडर, गहराई से एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। उसकी बस्ती में लड़कियों को चौक-चौराहे तक जाने की इजाज़त नहीं थी। परिवारों को डर था कि कहीं छेड़छाड़ या अपहरण न हो जाए, बदनामी न हो। लड़कियाँ पढ़ती भी थीं तो बस शादी के लिए, आत्मनिर्भर बनने के लिए नहीं।

दीपमाला ने अपनी कहानी से लोगों को आईना दिखाया कि कैसे उसके पिता ने उसे इलाहाबाद पढ़ने भेजा था। “अगर मैं जा सकती हूँ,” वह कहती, “तो दूसरी लड़कियाँ क्यों नहीं?” उसकी बातों ने लोगों को सोचने पर मजबूर किया।

धीरे-धीरे उसकी हिम्मत लोगों के मन में बीज की तरह जड़ें जमाने लगी। परिवारों ने कहना शुरू किया कि  हमारी पीढ़ी आखिरी होगी जो ये काम करेगी। हमारे बच्चे नहीं। जो लड़कियाँ पहले घरों में कैद थीं, वे अब बाहर निकलने लगीं। आज, उसी बस्ती की बेटियाँ बनारस, लखनऊ, और इलाहाबाद में पढ़ रही हैं। वे कॉलेज में दाखिला ले रही हैं, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रही हैं, और वो सपने देख रही हैं जो उनकी माँएँ कभी नहीं देख सकीं।

दीपमाला का काम अब अपने समुदाय से आगे बढ़ चुका है। आज वह ‘ग्लोबल चैंपियंस फॉर दलित वुमन’ के साथ काम कर रही हैं। इससे पहले उन्होंने अलग-अलग समूहों और स्वतंत्र रूप से भी काम किया है।डिसोम फ़ेलो रहते हुए, उन्होंने वी द पीपल अभियान के कैपेसिटी बिल्डिंग ट्रैनिंग में हिस्सा लिया, जहाँ उन्होंने सीखा कि बातचीत को कैसे संगठित चर्चा में बदला जाए, और संविधानिक अधिकारों को लोगों की भाषा में कैसे समझाया जाए। इन तरीकों ने उनके काम को और प्रभावशाली बनाया। युवाओं के साथ मिलकर उन्होंने अंबेडकर सोशल कैफै  भी शुरू किया - एक ऐसा मंच जहाँ लोग बहस कर सकें, सीख सकें, और समानता की कल्पना कर सकें।

उनके समुदाय में बदलाव की कहानी सीधी नहीं है - यह संघर्ष और साहस, विरोध और उम्मीद, धीमी प्रगति और उभारों का चक्र है। कभी उनके अपने लोग ही विरोध में खड़े हुए, कभी संस्थाएँ साथ देने से मना कर देतीं। लेकिन दीपमाला ने एक विश्वास कभी नहीं छोड़ा -  बदलाव संभव है।

और यह बदलाव हमेशा एक सवाल से शुरू होता है।


 सवाल से साहस जन्म लेता है।


 और साहस से पैदा होती है वह आस्था —


 कि गरिमा कोई सपना नहीं, यह हमारा अधिकार है।


 
 
 

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