जिस दिन दुर्गेश ने बोलने का फैसला किया
- We, The People Abhiyan

- 3 days ago
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12वीं के बाद उसने पढ़ाई छोड़ दी थी। एक साल के भीतर, जब भी गाँव में व्यवस्था से जुड़ी कोई समस्या आती, लोग दुर्गेश के पास आने लगे।
कालीपीठ में राशन रजिस्टर एक अलग ही कहानी बता रहा था: हर महीने गेहूँ और चावल बाँटे जा रहे थे, समय पर। लेकिन जिन घरों के लिए यह राशन था, वहाँ की कहानी बिल्कुल अलग थी - तीन महीने से राशन नहीं मिला था। गाँव के लोगों को इस फर्क का पता था और दुर्गेश को भी, लेकिन लंबे समय तक उसे लगता रहा कि इसके लिए कुछ किया नहीं जा सकता।
वह राशन जो घरों तक नहीं पहुँच रहा था
दुर्गेश ने 12वीं के बाद पढ़ाई छोड़ दी थी और दूसरे काम में लग गया था। तभी 2025 में अहिंसा वेलफेयर सोसाइटी कालीपीठ में वॉलंटियर्स की तलाश में आई। उसने उनका टेस्ट दिया, चुना गया और उनके साथ ट्रेनिंग ली। उसे आज भी याद है कि तब वह कैसा था -
“पहले मैं सबसे लास्ट में जाके बैठता था, ऐसे ही छुपता था। लेकिन आज मैं बात खुल के कर पा रहा हूँ।”
अहिंसा वेलफेयर सोसाइटी के साथ जुड़ने से उसका चीज़ों को देखने का नजरिया बदला। संस्था के संस्थापक अरुण सतलकर के कहने पर उसने दोबारा पढ़ाई शुरू की और बैचलर ऑफ सोशल वर्क में दाखिला लिया। अब वह अपने गाँव की समस्याओं को भी अलग नजरिए से देखने लगा था। राशन की समस्या, जो सालों से उसके मन में कहीं बनी हुई थी, अब ऐसी चीज़ नहीं लगती थी जिसे बस सहते रहना है।
बाद में वी द पीपल अभियान के साथ हुई एक ट्रेनिंग ने उसे वह चीज़ सिखाई जो उसके लिए बहुत अहम साबित हुई - जो समस्या वह देख रहा था, उस पर कार्रवाई कैसे करनी है। उसने सीखा कि आवेदन कैसे लिखना है, उसे कहाँ देना है और किस विभाग से संपर्क करना है।
“ट्रेनिंग में मुझे एप्लिकेशन देना सिखाया था कि कैसे क्या देना है।”
इसके बाद उसने गाँव में लोगों से बात करना शुरू किया। वह कालीपीठ में घर-घर जाकर पता करने लगा कि किसे राशन मिल रहा है और किसे नहीं। उसने नामों की सूची बनाई, लोगों के हस्ताक्षर लिए और कलेक्टर कार्यालय के फूड ऑफिस में आवेदन दिया। करीब सौ गाँव वाले उसके साथ वहाँ गए।
इसके बाद अधिकारी गाँव में आए और रजिस्टर में दर्ज जानकारी को लोगों को मिले राशन से मिलाकर देखा। रिकॉर्ड में राशन बाँटे जाने की बात थी, लेकिन गाँव वालों ने कुछ और बताया। आखिरकार पता चला कि राशन की दुकान चलाने वाले ने काफी समय से राशन बाटा ही नहीं था। कार्यवायी के बाद उसे निकाल दिया गया और कालीपीठ के परिवारों को हर महीने राशन मिलने लगा।
अब गाँव वाले उसे ढूँढते हैं
राशन की समस्या सिर्फ शुरुआत थी। इसके बाद दुर्गेश ने स्कूल छोड़ चुके बच्चों को दोबारा स्कूल पहुँचाने में मदद की, किसानों के साथ जैविक खेती पर काम किया और अब पास के एक गाँव में हर रविवार मुफ्त कोचिंग क्लास चलाता है।
लेकिन उसके बदलाव का सबसे साफ असर एक छोटी-सी बात में दिखता है: जब कालीपीठ में किसी को कोई समस्या होती है, तो वे दुर्गेश को फोन करते हैं। उसके मुताबिक, अब तक वह गाँव के करीब 2,000 लोगों में से 700–800 लोगों के साथ सीधे काम कर चुका है। उसके साथ करीब 20 युवा भी काम करते हैं।
जो लड़का कभी कमरे के सबसे पीछे जाकर छिप जाता था, अब किसी के बुलाने का इंतजार नहीं करता कि उसे बोलना है।
अब गाँव वाले खुद उसे ढूँढते हुए आते हैं।
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