रिया पासवान: जो सवाल पूछती है और जवाबदेही मांगती है
- We, The People Abhiyan

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"मैं एक ज़िम्मेदार नागरिक हूँ।"
अपनी आवाज़ ढूंढना
2022 में, बिहार में एक सरकारी कार्यक्रम (सशक्त बेटी, समृद्ध बिहार) में, एक युवा लड़की ने एक वरिष्ठ IAS अधिकारी से एक सीधा सवाल पूछा - सरकार सैनिटरी पैड्स को सस्ता क्यों नहीं बना सकती?
अधिकारी ने जवाब देने की बजाय उसे डांट दिया। लेकिन कमरे में कोई उसे फिल्मा रहा था। कुछ ही दिनों में यह वीडियो हर जगह फैल गया, और पूरे देश को उस लड़की का नाम पता चल गया जिसने यह सवाल पूछा था - रिया पासवान।
रिया तब 19 साल की थीं - पटना की एक झुग्गी बस्ती से निकली मनोविज्ञान की स्नातक, जो सेव द चिल्ड्रन नामक एक संस्था के साथ फैसिलिटेटर के तौर पर काम कर रही थीं। यह सवाल उसके मन मे यूं ही नहीं आया था। कुछ महीने पहले, पास के एक मुसहर बस्ती की एक दोस्त के साथ चाय पीते हुए उन्हें पता चला कि वह लड़की सैनिटरी पैड इस्तेमाल नहीं करती क्योंकि उसकी ₹40 की कीमत का मतलब था परिवार के लिए एक वक्त का खाना छोड़ना। यह बात रिया के मन में रह गई। जब उन्हें यह सवाल किसी ऐसे व्यक्ति से पूछने का मौका मिला जो इसका जवाब दे सकता था, उन्होंने पूछ लिया।
जो पहचान मिली
इस पल ने वाकई कुछ बदल दिया। इसने बिहार की मुख्यमंत्री किशोरी स्वास्थ्य कार्यक्रम योजना में एक खामी को उजागर किया, जिसके तहत सरकारी स्कूलों की किशोरियों को सैनिटरी नैपकिन खरीदने के लिए ₹300 दिए जाते हैं - लेकिन यह लाभ लगातार लड़कियों तक नहीं पहुंच रहा था। वीडियो बिहार से बाहर भी फैल गया, और राष्ट्रीय महिला आयोग ने इस मामले का संज्ञान लेते हुए अधिकारी से जवाब भी मांगा।
रिया बताती हैं कि इसके बाद पैसा फिर से लड़कियों के बैंक खातों में पहुंचने लगा। सीख साफ़ थी - किसी बात को इतनी ज़ोर से उठाओ कि वह चुप्पी में गुम न हो जाए।
तब से उन्होंने इसे अपना तरीका बना लिया। 2024 में, उन्होंने EVA फाउंडेशन के साथ नौ महीने बिताए, जातिगत हिंसा और भेदभाव के मामलों पर काम करते हुए, और फिर वी द पीपल अभियान के संविधान से समाधान प्रशिक्षण में हिस्सा लिया। इस प्रशिक्षण ने उन्हें उस चीज़ के लिए शब्द दिए जो वह पहले से कर रही थीं - मौलिक अधिकारों की भाषा। उन्होंने संविधान की एक प्रति खरीदी, उसे साथ रखना शुरू किया, और अनुच्छेद 32 सीखा, सीधे सुप्रीम कोर्ट जाने का अधिकार, जब किसी मौलिक अधिकार का उल्लंघन हो। जब पुलिस अब उनसे पूछती है कि वह कौन हैं, उनका जवाब नहीं बदलता: "मैं एक ज़िम्मेदार नागरिक हूँ।"
एक नागरिक जो अब भी सवाल पूछ रही है
रिया अपनी सक्रिय नागरिकता को अपने निजी जीवन और समुदाय, दोनों में निभाती हैं। प्रशिक्षण के कुछ महीनों बाद, उनकी भाभी के भाई की नालंदा में एक जातिगत हिंसा की घटना में हत्या हो गई। जब पुलिस ने शुरू में FIR दर्ज करने से इनकार किया, रिया थाने गईं और कहा कि FIR दर्ज कराना उनका अधिकार है। लगातार कोशिशों के बाद FIR दर्ज हुई। मामला अभी जांच में है, और रिया हर कदम पर फॉलो-अप करती रहती हैं।
उनके सवाल समुदाय की सुरक्षा से भी जुड़े हैं। 2023 में, जब उनके इलाके से एक लड़की लापता हो गई, रिया ने वार्ड ऑफिस, मेयर और जिला मजिस्ट्रेट को CCTV कैमरे लगवाने के लिए आवेदन दिया। उन्होंने लगातार फॉलो-अप किया; 2025 में आखिरकार जवाब आया, जिसमें कैमरे लगाने की जगहों का ब्योरा मांगा गया। लेकिन कैमरे कभी नहीं लगे। इसके बजाय, जुलाई 2025 में, उन्हें हिंसक धमकियां मिलीं और उनके खिलाफ एक मामला दर्ज कर दिया गया।
इनमें से कुछ भी उन्हें रोक नहीं पाया। आज, बिना किसी स्थायी नौकरी के, उनके दिन अब भी लोगों की मदद करने में बीतते हैं। पूरे बिहार से उन्हें हिंसा, भेदभाव और अन्याय के मामलों पर फोन आते हैं, और वह लोगों को थानों और अन्य संस्थाओं तक पहुंचने में मदद करती हैं। अब वह सोशल वर्क में मास्टर्स करने और अपनी पढ़ाई जारी रखने की उम्मीद कर रही हैं।

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