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बराबरी की शामें: हेमलता रावत और चुंडी की लड़कियाँ

  • Writer: We, The People Abhiyan
    We, The People Abhiyan
  • Feb 19
  • 3 min read

राजस्थान के चुंडी गाँव में दिन तो वैसे ही गुजरते हैं, लेकिन रातें कुछ अलग नज़ारा दिखाती हैं। गाँव के मंदिर के बगल का एक छोटा-सा कमरा हर शाम एक अनोखे बदलाव का गवाह बनता है। यहाँ किशोर लड़कियाँ इकट्ठी होती हैं, कुछ अब भी घूंघट में, कुछ खुले सिर के साथ, सीखने, सवाल पूछने और अपने आने-जाने पर लगी रोक-टोक को अपने तरीके से चुनौती देने के लिए। दीवारें पुरानी ज़रूर हैं, लेकिन अंदर जो हो रहा है, वह बिलकुल नया है। वे फ़िल्में देखती हैं, बातचीत करती हैं, अपनी कहानियाँ साझा करती हैं, और पहली बार जाति की सीमाओं को तोड़कर साथ बैठकर खाना खाती हैं।

इस बदलाव के पीछे कि वजह है - 28 साल की हेमलता रावत। उनकी ऊर्जा उनके काम और पूरे गाँव में महसूस की जा सकती है। हेमलता का काम एक-दो चीज़ों तक सीमित नहीं है। एक ही हफ्ते में वह किसी बुजुर्ग विधवा की पेंशन दोबारा शुरू करने में मदद कर सकती हैं, किसी ग्रामीण को RAJ-SSP ऐप समझा सकती हैं, पंचायत के लिए पानी बहाली का आवेदन लिख सकती हैं, और साथ ही अपनी लड़कियों के शाम के सत्र भी लेती हैं। एक ऐसी जगह जहाँ बराबरी की बातें अक्सर धीमे स्वर में कही जाती हैं, हेमलता एक दृढ़ और पहचानी जाने वाली उपस्थिति बन गई हैं।

MKSS (मज़दूर किसान शक्ति संगठन) और निरंतर ट्रस्ट के साथ काम करने के बाद, हेमलता अब अपने गाँव की 28 किशोर लड़कियों के साथ स्वतंत्र रूप से काम करती हैं। उनका ध्यान इस बात पर है कि लड़कियाँ संविधान और नागरिकता को अपने वास्तविक अनुभवों से जोड़कर समझें। गीतों ओर नारों के माध्यम से वे बराबरी, न्याय, स्वतंत्रता और बंधुत्व जैसे संवैधानिक मूल्यों पर उनके साथ ठोस चर्चाएँ करती हैं - और हर मूल्य को गाँव की स्थितियों से जोड़ती हैं: पानी के स्रोतों पर जाति आधारित भेदभाव, लड़कियों की आवाजाही पर रोक, और घर में असमान व्यवहार। उदाहरण के तौर पर, जब बराबरी की बात होती है, तो वह लड़कियों से पूछती हैं कि क्यों कुछ परिवारों को गाँव में एक ही कुएँ से पानी भरने या दूसरों के घर में प्रवेश करने की अनुमति नहीं है।

धीरे-धीरे लड़कियों ने इन मूल्यों को समझना शुरू किया। अब वे नियमित रूप से मिलती हैं, कई बार रात में भी, और खुद यह बैठकें, समाज के पुराने नियमों को चुनौती देती हैं। “जब हमने शुरू किया था, तो परिवारों ने विरोध किया। लेकिन जब देख लिया कि कुछ गलत नहीं हो रहा, तो और लड़कियाँ जुड़ने लगीं,” हेमलता कहती हैं। उनके लिए यह साधारण-सा साथ बैठना भी समुदाय की सोच में एक बड़ा बदलाव है।

उनका दृष्टिकोण अनुभव और प्रशिक्षण से विकसित हुआ है। स्कूल फॉर डेमोक्रेसी में कोऑर्डिनेटर रहते हुए, उन्होंने वी द पीपल अभियान का प्रशिक्षण लिया था। वहीं उन्होंने सीखा कि किसी भी समस्या की जड़ तक पहुँचना ज़रूरी है - यह पूछना कि “यह समस्या है क्यों?” यही सवाल उनके काम की दिशा बदलने वाला साबित हुआ। वह कहती हैं, “जब तक आप किसी समस्या को हल करने की कोशिश नहीं करेंगे, तब तक आप वास्तव में सीखेंगे नहीं।” इसी सोच को वह लड़कियों को भी सिखाती हैं, सोचो, समझो, और मिलकर हल निकालो।

उनके काम का असर पूरे गाँव में दिखता है। 2024 में जब चुंडी के 55 परिवारों को महीनों तक उनका गेंहूँ राशन नहीं मिला, तो हेमलता ने जन-सूचना पोर्टल पर जाकर गड़बड़ियों का पता लगाया। उन्होंने सभी प्रभावित परिवारों से हस्ताक्षर करवाए, लिखित आवेदन दिया, और सिर्फ दो दिनों में 1,051 किलो गेंहूँ उनके हकदारों तक पहुँच गया। उन्होंने गाँव की पानी सप्लाई सुधारने, असुरक्षित रास्तों पर स्ट्रीटलाइट लगवाने, और उन दस घरों के लिए सड़क बनवाने की प्रक्रिया भी आगे बढ़ाई - जो लगभग दस साल से इंतज़ार कर रहे थे। हर सफलता ने यह याद दिलाया कि लगातार कोशिश और एकता मिलकर बहुत कुछ बदल सकते हैं।

हेमलता की अपनी सोच भी इस सफ़र में बदली। वे मानती हैं कि पहले वे प्रगति को राजनीतिक जुड़ाव की नज़र से देखती थीं, लेकिन उनके अनुभवों ने उनकी समझ को गहराई दी। अब वह कहती हैं कि पहले वे खुद को प्राथमिकता देती थीं, लेकिन अब वे सबके बारे में सोचती हैं। उनके लिए असली जुड़ाव तभी होता है जब लोग जाति, धर्म या लिंग से ऊपर उठकर एक-दूसरे की साझा मानवता को देखें।

यही विचार उन्हें हर दिन दिशा देता है। उनके लिए काम सिर्फ ज़िम्मेदारी नहीं - यह उनका जीने का तरीका है। वह हल्की हँसी के साथ कहती हैं कि अगर वह एक दिन भी काम न करें, तो उन्हें बेचैनी होती है। और इसी लगन के साथ, वह लड़कियों की एक ऐसी पीढ़ी तैयार कर रही हैं जो सवाल कर सके, समझ सके और अपने लिए आवाज़ उठा सके।

The above story has been written and published with the explicit consent of the individual involved. All facts presented are based on WTPA's direct interaction with the individual, ensuring accuracy and integrity in our reporting.


 
 
 

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