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शांति को चुनना: हिम्मतनगर की कहानी

  • Writer: We, The People Abhiyan
    We, The People Abhiyan
  • 22 hours ago
  • 3 min read


पिछले साढ़े तीन सालों से गुजरात के साबरकांठा ज़िले के हिम्मतनगर तालुका के लालपुर, परबड़ा भोलेश्वर और कुछ शहरी इलाकों में जाति या धर्म के नाम पर कोई बड़ी हिंसा नहीं हुई है। ऐसा नहीं है कि यहाँ तनाव नहीं है। दूसरे कस्बों की तरह यहाँ भी कई सामाजिक परतें हैं, जाति, धर्म, रोज़गार का दबाव और राजनीति का असर। फर्क बस इतना आया है कि अब मतभेद सीधे सड़क पर नहीं आते और न ही तुरंत सोशल मीडिया पर भड़कते हैं। अब पहले वे गाँव स्तर की शांति समिति के पास जाते हैं।

यह समिति दलित और मुस्लिम समुदाय के युवाओं के बीच बार-बार हो रही सड़क झड़पों के जवाब में बनाई गई थी। इन प्रयासों के केंद्र में वाहिद थे, जिन्होंने दोनों समुदायों को एक ही मेज़ पर बैठाया, उनके मतभेद सुलझाने में अहम भूमिका निभाई और शहर में शांति बहाल करने की दिशा में काम किया।

वाहिद ऐसे माहौल में बड़े हुए जहाँ उन्होंने अपने आसपास धर्म और जाति के आधार पर फर्क को देखा। शिक्षा और रोज़गार के सीमित अवसर अक्सर ऐसा माहौल बना देते हैं जहाँ युवा आसानी से कट्टर या भड़काऊ सोच से प्रभावित हो जाते हैं। जब रोज़गार के विकल्प कम हों, गाँव से बाहर का अनुभव सीमित हो, और मोबाइल व सोशल मीडिया के ज़रिए लगातार विभाजनकारी बातें पहुँचती रहें, तो गुस्सा जल्दी जमा होने लगता है। ऐसे में जब ठहरकर सोचने की जगह नहीं होती, तो पहचान ही सबसे पहले सहारा बन जाती है।

जब पहचान ही विभाजन की सबसे आसान ज़मीन बनने लगी, तो वाहिद ने ऐसे मंच बनाना शुरू किए जो दूरी नहीं, बल्कि मेल-मिलाप को बढ़ावा दें, जहाँ युवा मिल सकें, बात कर सकें और साथ खेल सकें। “एकता टूर्नामेंट” ऐसी ही एक पहल थी, जिसमें अलग-अलग समुदायों के युवाओं की मिली-जुली टीमें बनाई गईं ताकि वे साथ खेलें। मकसद सीधा था| आपसी जुड़ाव, पहचान और भाईचारे की भावना को मज़बूत करना।

ये पहलें वाहिद के ‘इंस्टीट्यूशन फॉर स्टडीज़ एंड ट्रांसफॉर्मेशन’ (IST) के साथ किए गए काम से निकलीं, विशेष रूप से इसके युवाओं के साथ काम करने वाले कार्यक्रम ‘पहचान (Pehchaan)’ के माध्यम से। उन्होंने यहाँ स्वयंसेवक के रूप में शुरुआत की और बाद में फ़ैसिलिटेटर बने। इस काम के तहत उन्होंने यूथ सेंटर मॉडल के माध्यम से युवाओं की क्षमता निर्माण पर ध्यान दिया, ताकि वे एक सक्रिय नागरिक के रूप में अपने अधिकारों और ज़िम्मेदारियों को समझ सकें। उद्देश्य सिर्फ तनाव को रोकना नहीं था, बल्कि युवाओं को तनावपूर्ण परिस्थितियों में सोच-समझकर प्रतिक्रिया देने के लिए तैयार करना था।

आज ये युवा समूह समुदाय में जाकर मौलिक अधिकारों पर चर्चा करते हैं और बताते हैं कि उन्हें रोज़मर्रा की ज़िंदगी में कैसे लागू किया जा सकता है। वे वक्फ़ अधिनियम, 1995 और चुनावों से जुड़ी मतदाता सूचियों की विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया (SIR) जैसे मुद्दों पर भी बातचीत करते हैं। हाल ही में उन्होंने प्रस्तावना (Preamble) पर भी काम शुरू किया है, ताकि युवा उसके मूल्यों पर विचार कर सकें और देख सकें कि क्या वे मूल्य रोज़मर्रा की ज़िंदगी में अपनाए जा रहे हैं।

इस काम ने धीरे-धीरे यह बदला कि विवादों को कैसे संभाला जाए। अब तुरंत प्रतिक्रिया देने के बजाय युवा सोचने लगे, इस मुद्दे को सही तरीके से कैसे उठाया जाए?

इसीलिए उनके काम में यह भी शामिल है कि युवाओं को सिखाया जाए, अधिकारियों से कैसे मिलना है, आवेदन कैसे लिखना है, और समस्याओं को प्रतिक्रिया देने के बजाय संस्थागत तरीक़े से कैसे उठाना है। यहाँ संविधान सिर्फ एक दस्तावेज़ नहीं, बल्कि स्थानीय मुद्दों को रखने की एक भाषा बन जाता है। अपनी बैठकों में वे अक्सर पूछते हैं: “अगर हम दूसरों के अधिकारों का उल्लंघन करेंगे, तो अपने अधिकारों की बात कैसे करेंगे?”

वाहिद अपनी समझ को लगातार मज़बूत करते रहते हैं। ‘वी द पीपल अभियान’ (WTPA) और IST के सहयोग से आयोजित एक प्रशिक्षण ने उनके काम करने के तरीके को और स्पष्टता दी। संविधान पर केंद्रित चर्चाओं के माध्यम से उन्हें अधिकारों, प्रक्रियाओं और लिखित शिकायतों में मुद्दों को प्रभावी ढंग से रखने की बेहतर समझ मिली। इस सीख का उपयोग उन्होंने व्यावहारिक स्थितियों में भी किया, जैसे स्कूल के पास खुले नाले के मुद्दे को उठाते समय आरोप लगाने के बजाय बच्चों की सुरक्षा और रोज़मर्रा के खतरे पर ध्यान केंद्रित किया।

आज भी शांति समिति सक्रिय है, चाहे कभी-कभी तनाव की स्थिति क्यों न बने। मतभेद अब भी होते हैं, लेकिन अब एक ऐसी जगह है जहाँ लोग सबसे पहले जाते हैं। प्रतिक्रिया से बातचीत की ओर यह बदलाव साफ दिखाई देता है, और इस बदलाव का श्रेय उस समुदाय को जाता है, जिसने मिलकर यह संभव किया।


The above story has been written and published with the explicit consent of the individual involved. All facts presented are based on WTPA's direct interaction with the individual, ensuring accuracy and integrity in our reporting.


 
 
 

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