लेखन के ज़रिए अधिकारों की लड़ाई: सुनीता देवी की कहानी
- We, The People Abhiyan

- 2 hours ago
- 3 min read

सुनीता देवी की कहानी सिर्फ सरकारी व्यवस्थाओं के साथ काम करने की कहानी नहीं है, बल्कि यह एक ऐसी महिला की कहानी है जिसने अपने अधिकारों को समझा, उन्हें अपने जीवन में अपनाया और दूसरों को भी उनके अधिकारों के लिए आवाज़ उठाना सिखाया।
झारखंड के दातोखुर्द गाँव से आने वाली सुनीता आज अपने समुदाय में एक ऐसी महिला के रूप में पहचानी जाती हैं जो लोगों की समस्याओं का समाधान करवाती हैं। चाहे राशन न मिलना हो, महीनों से रुकी हुई पेंशन, खराब हैंडपंप या सरकारी सूची में नाम न होना, लोग अब जानते हैं कि सुनीता उनकी मदद कर सकती हैं। इस बदलाव के पीछे सबसे बड़ा साधन है, आवेदन लिखना।
सुनीता अक्सर कहती हैं:
“जहाँ संविधान नहीं पहुँचता, वहाँ मैं लोगों को उससे जोड़ना चाहती हूँ।”
उनके लिए यह जुड़ाव लोगों की समस्याओं को लिखकर सरकार तक पहुँचाने से होता है, ताकि उनकी आवाज़ अनसुनी न रहे।
सुनीता पहले से ही समाज के कामों में सक्रिय थीं। उन्होंने 2009 में Public Welfare Development Center के साथ काम शुरू किया। उन्होंने E-Shakti और Gali Gali Sim Sim जैसी पहलों में योगदान दिया और JSLPS के तहत उद्योग मित्र के रूप में भी काम किया। उन्होंने महिलाओं के स्वयं सहायता समूह (SHG) बनाए, बैंक खाते खुलवाने और लोन दिलाने में मदद की। समय के साथ उन्होंने लगभग 100 SHG को मजबूत किया। जलबहिया के रूप में उन्होंने गाँव में पानी, सफाई और स्वच्छता पर भी काम किया।
लेकिन उस समय उनका काम अधिकारों की समझ से ज्यादा मेहनत पर आधारित था। वे लोगों की मदद तो कर रही थीं, लेकिन उन्हें यह साफ़ समझ नहीं थी कि संवैधानिक अधिकार भी बदलाव का एक मजबूत साधन हो सकते हैं।
यह बदलाव तब आया जब उन्होंने Ambedkar Foundation के साथ We The People Abhiyan की ट्रेनिंग में हिस्सा लिया।
इस ट्रेनिंग में उन्होंने मौलिक अधिकारों के बारे में सीखा और समझा कि ये सिर्फ किताबों की बातें नहीं, बल्कि रोज़मर्रा की ज़िंदगी में इस्तेमाल किए जाने वाले अधिकार हैं। साथ ही उन्होंने प्रभावी तरीके से आवेदन लिखना भी सीखा। इसके बाद उन्होंने अधिकारों की समझ और आवेदन लिखने, दोनों का इस्तेमाल अपने और समुदाय के मुद्दे सुलझाने में करना शुरू किया।
उन्हें एक घटना याद है जब वे दातोखुर्द के एक दूरदराज़ गाँव में गईं, जहाँ लोगों के पास पानी और सड़क जैसी बुनियादी सुविधाएँ भी नहीं थीं। लोग नदी का पानी पीते थे और सड़क न होने के कारण आने-जाने में बहुत परेशानी होती थी। सुनीता ने इस समस्या को लेकर आवेदन लिखा और कुछ समय बाद वहाँ बोरवेल लग गया।
लेकिन सड़क का काम शुरू नहीं हुआ और बारिश का मौसम आने वाला था। तब उन्होंने इंतज़ार करने के बजाय गाँव के लोगों को साथ जोड़ा और सबने मिलकर खुद सड़क बना ली। बाद में उन्होंने पास के एक और गाँव में भी लोगों के साथ मिलकर सड़क बनाई।
उस समय को याद करते हुए वे मुस्कुराकर कहती हैं:
“हमने एक गाना भी बनाया था
‘ये रोड कौन बनाया
सरकार नहीं, हम बनाया।”
यह गाना आज भी उन्हें याद दिलाता है कि जब लोग इंतज़ार करना छोड़ देते हैं, तो मिलकर बहुत कुछ बदल सकते हैं।
सुनीता अब महिलाओं के साथ घरेलू हिंसा, भेदभाव और अन्याय जैसे मुद्दों पर भी बात करती हैं। वे समझाती हैं कि हिंसा या चुप्पी कोई “सामान्य” बात नहीं है, बल्कि यह मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। उन्होंने अपने जीवन में भी समानता को अपनाया और समाज की आलोचनाओं से डरना छोड़ दिया।
उन्होंने महिलाओं की आवाजाही और आत्मनिर्भरता को भी बढ़ावा दिया। जहाँ पहले महिलाएँ अकेले बाहर जाने से हिचकती थीं, वहीं सुनीता ने खुद स्कूटर चलाना सीखा और दूसरी महिलाओं को भी प्रेरित किया। आज उनके इलाके में कई महिलाएँ स्वतंत्र रूप से आ-जा पाती हैं क्योंकि सुनीता ने अपने उदाहरण से यह रास्ता बनाया। वे ग्राम सभा की बैठकों में भी खुलकर मुद्दे उठाती हैं और लोग उनकी बातों को गंभीरता से सुनते हैं।
सुनीता देवी की कहानी हमें यह सिखाती है कि अधिकार सिर्फ पढ़ने के लिए नहीं होते, बल्कि उन्हें अपने जीवन में अपनाने और इस्तेमाल करने के लिए होते हैं। और जब उन्होंने यह समझ लिया, तो उन्होंने सिर्फ अपने लिए नहीं, बल्कि सैकड़ों लोगों के लिए उनके अधिकारों की राह आसान बनाई।
The above story has been written and published with the explicit consent of the individual involved. All facts presented are based on WTPA's direct interaction with the individual, ensuring accuracy and integrity in our reporting.

%20(4).png)


Comments