संघर्ष से सम्मान तक: संतोष की कहानी
- We, The People Abhiyan

- 2 days ago
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पहले स्कूल में दाखिले का एक अनोखा तरीका था। बच्चे को अपना हाथ सिर के ऊपर से ले जाकर दूसरा कान छूना होता था। अगर हाथ कान तक पहुँच जाए, तो उसे स्कूल में दाखिला मिल जाता था।
संतोष ने भी कोशिश की। उनका हाथ कान तक नहीं पहुँचा। उस समय उनकी उम्र छह साल थी। स्कूल जाने की जगह वे फिर से बकरियाँ चराने लगे।
कुछ समय बाद उनकी ज़िंदगी ने नया मोड़ लिया। उनके पिता के यहाँ अक्सर दो लोग आते थे—लडकत और खामकर। एक दिन पिता घर पर नहीं थे। संतोष ने उन्हें उधार देने से मना कर दिया। जब पिता लौटे, तो उन दोनों ने शिकायत नहीं की। उन्होंने सिर्फ इतना कहा, "पहले इस लड़के को स्कूल भेजो।"
अगले ही दिन तेरह साल की उम्र में संतोष का पहली कक्षा में दाखिला हो गया।
संतोष पारधी समुदाय से आते हैं। अंग्रेज़ों के समय इस समुदाय को "अपराधी जनजाति" घोषित कर दिया गया था। कानून बदल गया, लेकिन उससे जुड़ा भेदभाव आज भी बना हुआ है। उनके पिता पर डकैती का झूठा आरोप लगाया गया और उन्हें कई साल जेल में रहना पड़ा। केस लड़ने के लिए परिवार को अपनी दो एकड़ ज़मीन बेचनी पड़ी।
स्कूल में भी संतोष को भेदभाव का सामना करना पड़ा। श्रीगोंदा के एक छात्रावास में कुछ छात्रों ने उन्हें जंगल में ले जाकर पीटा और कहा, "पारधी लोग चोरी करते हैं और फिर मना कर देते हैं।"
बचपन में ही संतोष समझ गए थे कि उनका समुदाय सिर्फ गरीबी ही नहीं, बल्कि भेदभाव और अन्याय से भी लड़ रहा है।
पढ़ाई पूरी होने के बाद उनके सामने सरकारी नौकरी का अवसर था। लेकिन उन्होंने दूसरा रास्ता चुना।
वे कहते हैं,
"अगर मैं सरकारी नौकरी कर लेता, तो सिर्फ मेरी और मेरे परिवार की ज़िंदगी बदलती। लेकिन मेरे समाज के साथ हो रहे अन्याय के खिलाफ कौन खड़ा होता?"
वह ज़मीन जो अडिग रही
अपने समुदाय के लोगों को कानून और अधिकारों की जानकारी दिलाने के उद्देश्य से संतोष इकोनेट संस्था की पैरालीगल फेलोशिप से जुड़े। उनका मानना था कि न्याय पाने के लिए लोगों को अपने अधिकारों और कानून की जानकारी होना ज़रूरी है। वे लोगों को उनके अधिकार, सरकारी योजनाएँ और कानूनी प्रक्रियाएँ समझाने में मदद करते थे।
इसी दौरान उन्होंने वी द पीपल अभियान का प्रशिक्षण लिया। इस प्रशिक्षण में उन्होंने सीखा कि संविधान के प्रावधानों और सरकारी आदेशों का हवाला देकर ऐसे आवेदन कैसे लिखे जाएँ, जिनका जवाब देना अधिकारियों की कानूनी ज़िम्मेदारी हो।
इस सीख की सबसे बड़ी परीक्षा लोनी व्यंकनाथ गाँव में हुई। वहाँ लगभग सत्तर एकड़ चरागाह की ज़मीन पर कई वर्षों से भूमिहीन पारधी परिवार रह रहे थे। सरकार ने उस ज़मीन को सोलर परियोजना के लिए दे दिया और परिवारों से घर खाली करने को कहा। उनके पास जाने के लिए कोई दूसरी जगह नहीं थी। संतोष ने ग्राम पंचायत, तहसीलदार और बीडीओ को आवेदन दिए। जब कहीं से कोई कार्रवाई नहीं हुई, तो वे अदालत पहुँचे और तहसील कार्यालय के बाहर अनिश्चितकालीन धरना शुरू किया। आख़िरकार अदालत ने फैसला दिया कि इन परिवारों के घर नहीं तोड़े जा सकते। परिवार वहीं रह सके।
अब लोग खुद अपनी आवाज़ उठाते हैं
साल 2022 में संतोष ने सहारा सर्वांगीण विकास संस्था की शुरुआत की। यह संस्था पारधी समुदाय के साथ शिक्षा, आजीविका, स्वास्थ्य और संवैधानिक जागरूकता पर काम करती है। लेकिन संतोष जिस बदलाव को सबसे महत्वपूर्ण मानते हैं, वह थोड़ा अलग है।
उन्होंने कई वर्षों तक अपने समुदाय के लोगों को ग्राम सभा में भाग लेने के लिए तैयार किया। लोगों को यह सिखाया कि वे अपनी समस्याएँ खुद रखें, किसी और का इंतज़ार न करें।
वे कहते हैं,
"पहले लोगों को यह भी नहीं पता था कि ग्राम सभा क्या होती है। अब वे खुद जाते हैं और अपनी बात रखते हैं। हो सकता है कि वे हर बार बिल्कुल सही तरीके से न बोलें, लेकिन अब वे बोलते हैं।"
आज संतोष एक प्रशिक्षण केंद्र भी बना रहे हैं, जहाँ बच्चे कंप्यूटर सीखेंगे और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर सकेंगे। 26 नवंबर 2025, संविधान दिवस के अवसर पर उन्होंने अपने घर के बाहर संगमरमर पर संविधान की प्रस्तावना स्थापित की। उन्होंने इस जगह का नाम रखा - संविधान कट्टा।
यह किसी बड़े भवन में नहीं, बल्कि एक साधारण जगह पर बना है। लेकिन यह हर आने-जाने वाले को याद दिलाता है कि अधिकार उन्हीं के होते हैं, जिन्हें अपने अधिकारों की जानकारी होती है।
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